रीवा का इतिहास

रीवा राज्य का इतिहास: धवाई पंचम सिंह बरगाही का बलिदान
बाँदा के राजा अलीबहादुर उर्फ कृष्ण सिंह, जिनके सेनापति ‘नायक जसवंत राव निम्बालकर(बरगाही क्षत्रिय) ने राजा अजीत सिंह के शासन काल में ‘नयकहाई युध्द’ रोपी थी। पेशवाजादा दोनो बाप बेटे की पूना में मराठा माहौल में ही परवरिश हुई थी। दोनो ही मराठा सेना के साथ युद्ध अभियानो में जाया करते थे तथा पेशवाजादा होने की हैसियत से इनको उचित सम्मान मिलता था। इन्हे पेशवाई का प्रतीक ‘जरी पटका’ भी हासिल था, जिसके नीचे आकर अपराधी भी पकड़ धकड़ से बच जाते थे।

मच जाना बमचक बुँदेलखण्ड में, इधर रीमाँ राज्य में राजगद्दी पर बिराजमान होना महाराजा अजीत सिंह का।

महाराजा छत्रसाल के अवसान सन 1733 के बाद, उनके बेटों, हिरदे साह और जगत राय के बीच बटवारे को लेकर गृहयुद्ध की स्थिति बन गई। बाजीराव पेशवा भी नहीं रहे, जिन्हे बुँदेलखण्ड का तीसरा पश्चिमी भाग मिला हुआ था। मचा हुआ था बमचक बुँदेलखण्ड में। आजमाने लगे अपना जोर बाहुबली राजे और जागीरदार। उस समय जैतपुर के बटवारे से चरखारी एवं बाँदा में दो सगे भाई राज्य कर रहे थे, जिनके बीच गोद लेने का झगड़ा उठ खड़ा हुआ।
सन 1755 में रीमाँ के राजा अवधूत सिंह के स्वर्गारोहण के बाद, राजा अजीत सिंह राजगद्दी पर बिराजमान हुये। राज्य में तब अमन चैन था। सन 1781 में राजा पन्ना अनिरुद्ध सिंह के स्वर्गवास के बाद लहुरे भाई धौकल सिंह को बैठा दिया गया था राजगद्दी पर। तब जेठे सिरनेत सिंह ने विरोध किया। राजा धौकल सिंह के दीवान और सेनापति बने बेनी हुजूरी। सन 1783 में राजा मधुकर सिंह ने बाँदा में सत्ता सम्हाली। जिनके दीवान और सेनापति हुये नोने अर्जुन सिंह पवार। राजा मधुकर सिंह की मृत्यु हो जाने पर उनके नाबालिग बेटे बखत सिंह के बाँदा राज्य के ‘रीजेन्ट’ भी बन बैठे अर्जुन सिंह और पन्ना के झगड़े में लिप्त हो कर बेनी हुजूरी से बैर ठान लिया। सन 1788 में छतरपुर के पास गोठरी में युद्ध हुआ, बेनी हुजूरी मारे गये और अर्जुन सिंह गंभीर रूप से घायल हो गये। यही तो बचे थे जो मराठों से पंगा ले सकते थे, जिन्होने पन्ना राजा धौकल सिंह, चरखारी राजा विजय बहादुर और अजयगढ़ राजा गज सिंह को दबा रखा था।
आना कृष्ण सिंह उर्फ अलीबहादुर का बुँदेलखण्ड, हासिल करना हैसियत बाँदा नवाब की।
पूना में पेशवाजादा शमशेर बहादुर प्रथम के पुत्र अलीबहादुर के पास चरखारी के वकील ने जाकर बुँदेलखण्ड की कैफियत जाहिर करते, शिकायत की कि नोने अर्जुन सिंह पवार, बाँदा के दीवान एवं सेनापति ने राजा विजय बहादुर को बेदखल कर के राज्य छीन लिया है और पन्ना राज्य पर भी अनाधिकार कब्जा कर लिया है। नोने अर्जुन सिंह के खिलाफ बुँदेलखण्ड के अन्य राजाओं ने भी एसी ही शिकायतें कर रखी थीं। यह सब सुन जान कर अलीबहादुर ने बुँदेलखण्ड में प्रवेश किया, साथ में थे सहायक, राजा ‘अनूप गिरि‘ हिम्मत बहादुर गोसाँई, गनी बेग, दीवान सदाशिव अंबालकर और सेनापति ‘नायक’ जसवंत राव निंबालकर जो एक बरगाही/हटकर क्षत्रिय थे।
नायक पदवी, महाराष्ट्र में वीर बरगाही/हटकर क्षत्रियों को दी जाती थी (देखे हटकर विकिपीडिया). जसवंत राव, ‘नायक‘ के नाम से ही अधिक प्रसिद्ध रहे हैं, तभी तो उनके और रीमाँ वालों के बीच लड़े गए युद्ध को ‘नैकहाई जुज्झि’ की संज्ञा मिली। कहा यह जाता है कि जसवंत राव निम्बालकर ने अपने बलबूते नौ राज्यों को नवाब बाँदा के अधीन करा देने से ‘नायक’ की पदवी हासिल की थी।
बात सन 1791 की है जब अलीबहादुर ने धसान नदी पार कर के पन्ना के धौकल सिंह और जैतपुर के गज सिंह को आधीनता स्वीकार कराते पूना के पेशवा का बकाया राज्य कर अदा करने को बाध्य किया। तत्कालीन बुँदेलखण्ड मे सबसे शक्तिशाली माने जाने वाले बाँदा के दीवान और रीजेन्ट नोने अर्जुन सिंह पवार, उस समय अजयगढ़ में पड़ाव डाले पड़े थे। जसवंत राव एक बड़ी सेना लिये जाकर चढ़ाई कर बैठा। साथ थी गनी बेग और हिम्मत बहादुर की सेना भी। अलीबहादुर की इस विशाल सेना ने अर्जुन सिंह की पैदल सेना को परास्त कर दिया। तब अर्जुन सिंह ने हाथी पर चढ कर बैरी दल पर धावा बोला। महावत मारा गया तो खुद उसकी जगह लेकर पवार तीर और तमंचा चलाता रहा, किन्तु बुरी तरह से घायल होकर धरती पर आ गिरा। तीन सौ सिपाही उसके हाथी के आस पास मरे पड़े थे। नाबालिग राजा बखत सिंह बंदी बना लिया गया और अर्जुन सिंह का सर काट कर अलीबहादुर को अर्पित कर दिया गया। अर्जुन जैसे वीर योद्धा के मारे जाने से बुँदेलखण्ड में सनसनी फैल गई। अर्जुन सिंह की शहादत सन 1793 के 18 अप्रैल को हुई थी। तत्काल ही अलीबहादुर अजयगढ़ पर कब्जा कर बाँदा राज्य का स्वामी बन कर बाँदा को अपनी राजधानी बनाकर ‘नवाब‘ की उपाधि ग्रहण की।
अर्जुन सिंह के मारे जाने पर पन्ना के राजा धौकल सिंह से अलीबहादुर ने समझौते की बात चलायी। कहा कि ‘आप को लड़ाई का खर्च देना चाहिये। धौकल सिंह का जवाब था ‘टीका और पगड़ी तो मुझे पेशवा के यहाँ से प्राप्त हो गई है जिसका नजराना ले लिया जाय बस।’ नजराने की राशि दस लाख तय हुई। धौकल सिंह नजराना देने में हीला हवाला करते रहे।आगे राशि बढ़ा कर, कर दी गयी रुपये 17 लाख। धौकल सिंह को यह राशि न देनी थी और न दी ही। तब अलीबहादुर ने पन्ना पर चढ़ाई कर दी। धौकल सिंह अपने दीवान राजधर के साथ जंगल की राह पकड़ ली और किले पर मराठों का कब्जा हो गया। रिआयत करने पर भी जब धौकल सिंह की ओर से आना कानी हुई तो अलीबहादुर ने नायक जसवंत राव के द्वारा मड़फा की गढ़ी और गहोरा का परगना फतेह करा कर जागीर स्वरूप नायक को दे दिया। (यह परगना कभी बघेल राजाओं का हुआ करता था)।
आना राजा धौकल सिंह का रीमाँ, देना पनाह राजा अजीत सिंह का, होना बध खुमान सिंह के हाथो, गोपाल राव का और परिचय खुमान सिंह का।
इधर धौकल सिंह गायब हो गये। बुँदेलखण्ड छोड़ कर रीमाँ के राजा अजीत सिंह के यहाँ पनाह ले ली। इसके 35 वर्ष पहले सन 1758 की बात है, जब बादशाह शाह आलम का पीछा ईस्ट इण्डिया कम्पनी का लार्ड क्लाइव कर रहा था। बादशाह के साथ थी गर्भिणी बेगम मुबारक महल (लाल बाई)। महाराजा अजीत सिंह ने बेगम को पनाह दी थी। उनके रहने के लिये मुकुन्दपुर की गढ़ी और खर्चे के लिये यह परगना भी लगा दिया था। गढ़ी मुकुन्दपुर में ही बेगम ने जना था अकबर सानी को जिसे अकबर द्वितीय भी कहा जाता रहा। लेकिन तब राज्य रीमाँ की हालत खस्ता न थी, जैसी अब हो चली थी।
जब अलीबहादुर के कान में यह बात पड़ी कि धौकल सिंह रीमाँ में पनाह पाये हुये हैं, तब उनकी राज्यविस्तारवादी नजर इस ओर फिरी। सेनापति नायक जसवंत राव से परामर्श कर एक हजार सेना के साथ गोपाल राव को रीमाँ भेजा। बीच राह में इस सेना की मुठभेड़ हो गई खुमान सिंह बघेल से। जिन्होने अपने तीस जाँबाज सैनिकों के साथ धाबा बोल कर गोपाल राव का सर कलम कर दिया।
खुमान सिंह; रीमाँ राज्य की पश्चिमोत्तर सीमाँ से लगे बघेल रियासत कोठी के गाँव मनकहरी के ठिकानेदार रहे हैं। ये थे नाते में उन्नीसवी सदी सन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी अमर शहीद रणमत सिंह के पितामह के जेठे भाई। खुमान सिंह ने अपने जीवन काल में जब जब रीमाँ राज्य पर युद्ध के बादल छाये तब तब अपने भाई केसरी सिंह तथा इनके सात बेटों के साथ आकर बादलों को तिरोहित करने में मददगार रहे। इनका पूरा परिबार रीमाँ राज्य में बहुत मान्य रहा है। कई मुड़वार पवाइयाँ इस परिवार को रीमाँ राज्य की ओर से मिली हुई थीं।
पूर्व में कोठी राज्य के राजा जगतराय के भाई उदयंत राय को नैना और भरत शाह को मनकहरी मौजे बतौर गुजारा दिये गये थे जिनकी सीमा एक ही है। सरहद और रकबे को लेकर दोनो भाइयों के बीच चलता मनमुटाव उनके उत्तराधिकारियों के बीच भी चलता ही रहा आया। तीसरे पुश्त में यह मनमुटाब इतना बढ़ा कि नैना के ठाकुर महाराज सिंह और मनकहरी के ठाकुर खुमान सिंह एक दूसरे के जानी दुश्मन हो गये।
गोपाल राव का वध कर देने वाले खुमान सिंह, नवाब बाँदा अलीबहादुर के बैरी करार हुये। महराज सिंह ने काँटे से काँटा निकालने की योजना बनायी। वे जा पहुंचे बाँदा नवाब की मुलाजिमत करने। मौका निकाल कर; उन्होने अलीबहादुर के कान भरे, ‘आपके दो दो दुश्मन इस समय रीमाँ में हैं। एक धौकल सिंह दूसरे खुमान सिंह। रीमाँ राज्य की हालत भी खस्ता है। यह उचित समय है रीमाँ को आधीन कर लेने का। मैं रहूंगा मार्गदर्शक।’
अलीबहादुर को बात जँच गयी। साथ में बैठे नायक जसवंत राव से परामर्श कर रीमाँ राज्य पर चढ़ाई कर देने का हुक्म दे दिया। नायक ने दस हजार की सेना संगठित की। मकसद था प्रदर्शन, कि रीमाँ भयभीत होकर युद्ध नहीं करेगा और आधीनता स्वीकार कर के फौज हरजाना अधिक देगा तथा चौथ देना भी स्वीकार कर लेगा।
बाँदा से रवाना होकर नायक जा पहुँचा रीमाँ राज्य के उत्तरी इलाका जिरौंहा। जिसे बिना खून-खच्चर किये आधीनता स्वीकार कराते सरदेशमुखी चौथ बाँध दी। टाटी का भी यही अंजाम हुआ। फिर नायक कूच कर जा पहुँचा सेमरिया, जहाँ के इलाकेदार ने खूब आव भगत इसलिये की क्यों कि रीमाँ पर चढा़ई करने के लिये नायक को इन्होने भी आमंत्रित किया था। दोनो के बीच दुरभिसंधि थी कि रीमाँ को परास्त कर इलाकेदार सेमरिया को रीमाँ की राजगद्दी सौंप दी जायेगी। अतः नायक ने न तो सेमरिया को आधीनता स्वीकार करने के लिये विवश किया ना ही सरदेशमुखी चौथ की बात की। इस बाबत इतिहास का काला पन्ना छिपा है। तभी तो ‘श्री अजीत फते नायक रायसा’ के कवि दुर्गादास महापात्रकी कलम भी लड़खडा़ई है। दृष्टव्य है ग्रन्थ का छंद 67-
‘यारिमसे उलटा बाँचु, लीन मामला तासु न साँचु।
जीति जिरौहा टाटी लीन, आइ गोरैया थाना कीन।।
‘यारिमसे से उलटा बाँचु’, (बाँचु माने पढ़ो) तब व्यक्त होता है सेमरिया से मामला नहीं लिया सच बात नहीं है। जिरौहा और टाटी को जीत कर गोरैया में पड़ाव डाला।
दरसल बात यह थी कि बीते दो पुस्तों से सेमरिया इलाकेदारों की कोप दृष्टि रही है रीमाँ राज्य पर। लिखा जा चुका है कि रीमाँ के अपुत्र राजा भाव सिंह ने वंश वृद्धि बाबत सेमरिया के इलाकेदार अपने अनुज के जेठे बेटे मुकुन्द सिंह को गोद न लेकर लहुरे बेटे अनिरुद्ध सिंह को गोद लेकर अपने शासन काल में ही टीका कर दिया था। इसे नाजायज करार देते नाराज सेमरिया के इलाकेदार मुकुन्द सिंह ने राज्य शासन के विरुद्ध बगावत कर दी थी, जिसका अनुसरण उनके बाद की पीढि़यों ने भी किया। राजा अनिरुद्ध सिंह के अवसान के बाद उनके पुत्र अवधूत सिहं रीमाँ के राजगद्दी पर बिराजे। फिर इनके पुत्र राजा अजीत सिंह विराजे। यदि भाव सिंह ने मुकुन्द सिंह को गोद लिया होता तो सेमरिया के तत्कालीन इलाकेदार, राज्य रीमाँ के राजा होते।
रीमाँ राज्य के तत्कालीन बाबू जय सिंह को यह पता चला कि नायक ने गोरैया में पड़ाव डाल रखा है, तब वे कतिपय सरदारों के साथ नायक से पंगा लेने चल पडे़, गोरैया की ओर। (उन दिनो रीमाँ राज्य के युवराज को बाबू साहब का खिताब बहाल रहा है। उन्नीसवीं सदी के बाद कहे जाने लगे थे महाराज कुमार। सयाने सरदारों ने वहाँ की परिस्थिति का निरीक्षण कर बिना छेड़ छाड़ वापस चलने की जायज राय प्रकट की। उनकी बात को तरजीह देते दल वापस आ गया रीमाँ। (बाबू साहब जय सिंह का सदलबल चढ़ाई करने जाना ‘श्री अजीज फते रायसा’ रचनाकार की मात्र कल्पना है।-लेखक)
नायक का सदलबल गोरैया से कूच कर जा पहुंचना चोरहटा-बाबूपुर गाँव, करना कायम अस्थाई छावनी और करना मंत्रणा राजा अजीत सिंह का।
रीमाँ की दयनीय दशा से वाकिफ, राजा धौकल सिंह; जुज्झि विभीषिका निर्मित होने के पहले ही जा चुके थे। नायक जसवंत राव गोरैया से सदलबल प्रस्थान कर आ धमका रीमाँ शहर के पश्चिम प्रवाहित बीहर नदी पार (वर्तमान काल के रीवावासी इसे घोघर नदी कहते हैं) और बाबूपुर-चोरहटा में ‘कैम्प’ स्थापित किया। अलीबहादुर नवाब बाँदा का खरीता भेजा गया राजा अजीत सिंह के पास। जिसमें उल्लेख था कि राजा रीमाँ, बाँदा की आधीनता के साथ सरदेशमुखी-चौथ देना स्वीकार करें, अन्यथा रीमाँ किला नेस्त-नाबूद कर जाब्ते से राज्य कब्जे में कर लिया जायेगा।’ जवाब मे राजा अजीत सिंह ने अपने खरीते में लिखवाया कि ‘न हमने आज तक किसी को कर दिया न अब देंगे’ और आयी बला से निपटने के लिये मंत्रणा करने के लिये दरबार आयोजित करने की आज्ञा दी।
उपरहटी के उत्तरी नगरकोट के सामने, खलगा में उन दिनो कर्चुलियों,धउआ बरगाहियों तथा तेंदुनहा बघेल सरदारों के खपरैल डेरे थे। यहाँ मंत्रणा दरबार की खबर पहुँची और सरदारान जा पहुँचे किला के तत्कालीन दरबार में। उक्त काल तक किला के महलों ने वर्तमान स्वरूप नहीं ले पाया था। सरदारों को आई विपदा से अवगत कराते हुये राय मांगी गई कि आज की परिस्थिती में क्या करना उचित होगा? सयाने सरदारों ने राज्य की दयनीय दशा का बखान करते राय दी कि नायक के पास पंचो को भेज कर मामला पटा लिया जाय। युवक कर्चुली सरदार बहादुर सिंह ने विरोध करते हुए कहा कि ‘प्रजा को डाँट-फटकार कर त्रसित करके करवसूली करके बैरी को दें यह मुझ कर्चुली को असहनीय है। मैं युद्ध कर नायक का प्राणांत करूँगा।’ कर्चुलियों के सरगना इनके चाचा श्याम साह ने भतीजे की तारीफ कर उनकी बात का समर्थन किया।केवल धवाई पंचम सिंह बरगाही ने उनकी बात का समर्थन किया बाकी अन्य सरदार मौन रहे, मानों उन्हे साँप सूँध गया हो। राजा अजीत सिंह की पाँच रानियों में से तीसरी चँदेलिन महारानी कुन्दन कुँवरि सामने आईं और अपनी मनोवैज्ञानिक वार्ता, धिक्कार और चुनौती पूर्ण बातों से सरदारों को उत्तेजित कर दिया। कहा ‘आप लोग चूड़ी पहन नारी श्रृगार करें, सामग्री मैं लिवा लायी हूँ, अपनी तलवार मुझे दें, मैं रणांगन में जाऊँगी।’ रानी दो थालों में; दासियों के हाँथो जो सामग्री साथ लिवा लायीं थी। एक थाल में नारी वस्त्र और श्रृंगार समाग्री, दूसरे थाल में थे पान बीड़े। कर्चुली सरदार कलंदर सिंह और धवाई पंचम सिंह बरगाही तमक कर उठे और एक-एक बीड़ा उठा कर मुह मे डाल क्रोधित हो दाँत पीस पीस कर चबाने लगे। पान बीड़ा उठाना संकेत था युद्ध करने की स्वीकारोक्ति।
सरदारों का जुज्झि की तैयारी, बोल देना धावा और नायक को मार कर जीत लेना जुज्झि।
दरबार समापन पश्चात अपने डेरे में आकर सरदारों ने आपस में मंत्रणा कर युद्ध योजना निर्मित करते हुये इत्तला करने के लिये उन ठिकानो की ओर साँडि़या सवार रवाना किये जहाँ के लोग ऐसे युद्धों में भाग लिया करते थे। अपने साथ लड़ने वाले लोगों को भी सूचित किया। कहना न होगा कि राजीवी बघेल जिनके बड़े बड़े इलाके और पवाईदारियाँ रही हैं वे ऐसे पचड़े से दूर ही रहते थे। तभी तो उनके बारे में प्रचारित था कि ‘खिरकी (पछीत) से पराय के रसोइयाँ म लुकात हँय’। बहरहाल बमुश्किल दौ सौ सशस्त्र उन्मादी सूरमा आ जुटे। दो दल बने एक का नेतृत्व किया तेंदुन के बघेल गजरूप सिंह तथा दूसरे दल का रायपुर के कलंदर सिंह कर्चुली ने।
बीहर नदी पार कर गजरूप सिंह के दल ने नायक की सेना पर सामने से धावा किया। कलंदर सिंह का दल गोड़टुटा घाट छोड़, घोघर घाट से नदी पार कर पीछे से धावा किया। नायक की ओर से जहाँ राह रुकावट के लिये खेतो मे खड़े अरहर के पौधो को आपस में बँधवा दिया गया था। रायपुर वालों के सरूपा हाथी को सूँड़ मे साँकल पकड़ा दी गयी थी वह आगे आगे राह साफ करते हुए चल रहा था। कलंदर सिंह का दल रणांगन में पहुँचा, वहाँ भयंकर मारकाट मची हुयी थी। नायक हाथी पर सवार था साथ में नीचे घोड़े पर सवार थे नैना वाले महाराज सिंह। नायक जसवंत राव की दस हजारी सेना में भाड़े की सेनायें भी शामिल थी। कमानदार करनल मीसलबेक तो रास्ते में अटके थे, उनकी सेना तो रणांगन में उतरी ही नही। यही हाल हुआ हिम्मत बहादुर गोसाईं की नागा सेना और पठान सेना का। अँगरेजी में जिसे ‘ओवर कान्फीडेन्स’ कहा जाता है से प्रेरित नायक बस अपनी सेना को ही उतार कर घमण्ड से चूर, हाथी पर चढ़ा, रीमाँ सेना के रण कौशल का निरीक्षण कर रहा था। पंचम सिंह बरगाही जो सजे-बजे मोतियों की माला पहने शहीद हुए थे; को देख कर नायक ने महाराज सिंह से कहा था ‘बघेल जी राजा तो मारा गया। क्या यही हैं जाँबाज बघेल, जिनके जंग की आप तारीफ के पुल बाँधते थे? तभी आ धमका था कलंदर सिंह का दल, जिसे नायक की पहचान कराने के लिये कहा था महाराज सिंह ने कि ‘नायक जी आ गये बघेल’। महाराज सिंह को रीमाँ वालों ने धिक्कारा था कि बघेल हो कर तुम बघेलों के खिलाफ दुश्मन को चढ़ा लाये। महाराज सिंह की जमीर जागी तो वे यह हरकत कर बैठे थे।
नायक की पहचान होते ही, घेर लिया इस दल ने उसके हाथी को, दोनो ओर से बरछी, भाले और तलवारें चलने लगीं। नायक हाथी से उतर कर अपनी कबूतरी नाम की घोड़ी पर चढ़ने का उपक्रम कर ही रहा था कि प्रताप सिंह ने उसके छाती को लक्ष कर भाला मारा, साथ ही भगवान सिंह की बरछी आकर छाती बेधते कलेजे में जा घुसी। तभी बेहोश नायक का सर अमरेश ने काट कर झोली में डाला और भाग खड़े हुये। नायक के दल में भगदड मच गयी। रीमाँ वालों ने बैरी दल को कुछ दूर तक खदेड़ा फिर वापस हो जयकार करते चल दिये किला की ओर ,जहाँ विजय उत्सव मनाया गया।

धर देना उतार कर पगड़ी नवाब अलीबहादुर का और करना वसूल जुज्झि खर्च का राजा अजीत सिंह से।

अलीबहादुर को जब अपने बफादार बहादुर सिपहसालार के मारे जाने का समाचार मिला तो वह तड़प उठा। उसने अपनी पगड़ी उतार का धर दी और प्रण किया कि जब तक इसका बदला रीमाँ वालों से नहीं ले लूँगा पगड़ी नहीं बाँधूगा।
नैकहाई जुज्झि शिकस्त का असर कई आयामो पर पड़ा। बुँदेलखण्ड के कई राजे और जागीरदार अराजक होकर लूट-पाट मचाते नवाब का नाकों दम कर दिया। बंद कर दिया चौथ देना। अब तक राजा अजीत सिंह की भाँति अलीबहादुर भी ठन ठन गोपाल हो चले थे। जुज्झि के बाद दो वर्ष बीते, तब सन 1798 में अलीबहादुर दस हजारी सेना लेकर चल पड़े रीमाँ की ओर, जुज्झि हरजाना वसूलने। इस बार भी करनल मीसलबेक और हिम्मत बहादुर की सेना उनके साथ में थी। सेना को छूट थी कि रास्ते के गाँवों में वह अपने वेतन के एवज में जो भी चाहे लूट कर हासिल कर ले।
सेना आ पहूँची रीमाँ। नवाब बाँदा के प्रवक्ता हुये हिम्मत बहादुर गोसाईं और रीमाँ के कलंदर सिंह। नवाब ने हरजाना तय किया रुपये दस लाख। ना नुकुर, राज्य की दशा की दुहाई आदि करते कराते यह माँग गिरते गिराते अंततः जाकर ठहरी रुपये दो लाख में। किन्तु कहाँ था रोकड़ा रीमाँ के राजकोष में, वहाँ तो भूँजी भाँग नहीं थी, लोटती थी घुइस। हाँ जोड़ तँगोड़ राजा अजीत सिंह ने अपने पास से किसी तरह निकाले रुपये बारह हजार रोकड़। नौ नगद न तेरह उधार के तर्ज पर नवाब ने स्वीकार कर बकाया भुगतान के जमानत में कलंदर सिंह को अमानत बनाकर साथ लेकर वापस हो गये बाँदा। बाद में राजा अजीत सिंह ने त्योंथर का इलाका राजा माँडा के यहाँ गहन कर उधारी रकम माँग कर बाँदा भेजा और कलंदर सिंह बाँदा से वापस रीमाँ आये।

छिन जाना राज्य रीमाँ का दक्षिणी भूभाग और होना संधि ‘एच, ई, आई, सी, से, बाबू अलंकरण का बदल कर हो जाना महाराज कुमार।

दो वर्षों पूर्व की गयी संधि तोड़ कर सन 1808 में नागपुर के भोंसले राजा ने कब्जा कर लिया था, रीमाँ राज्य के दक्षिणी भूभाग पर। यही भूभाग वर्तमान में बन गया है मध्य प्रदेश का एक राजस्व संभाग शहडोल। इस भूभाग का उपभोग भोसले बहुत दिनों तक नहीं कर पाये। भोसले और एच, ई, आई, सी, याने आनरेबल ईस्ट इण्डिया कंपनी के साथ हुये युद्ध में 17 नवंबर 1817 को भोसले की पराजय हुई। नागपुर राज्य कम्पनी के स्वामित्व में आगया। तब स्वमेव रीमाँ राज्य का वह भूभाग अँग्रेजों के स्वामित्व में आ गया। सन 1809 में राजा अजीत सिंह का बैकुण्ठवास हो गया। बाबू जय सिंह राजा बन कर रीमाँ की राजगद्दी पर बिराजे। उस काल में राज्य कोष में मात्र हाथी दाँत के दो टुकड़े बचे पड़े हुये थे। एच ई आई सी के चपेट में इन्होने एक बार अक्टूवर सन 1812 और दुबारा 5 जून सन 1813 में संधि कर ली; जो अभिलेख में दर्ज हुई-(भ्वदतंइसम म्ंजप्दकपं ब्वउचंदलदक जीम त्ंरं श्रंपपदही क्मव त्ंरं वत्मूंदक डववानदकचववत) घ्यातव्य हं ‘राजा’ तथा ‘रेवाह ऐण्ड मूकुन्डपूर’ शब्द। नाम बिगाड़ू अँगरेज ही हैं जिन्होने रीमाँ को पहले रेवाह बाद में रेवा लिखते उच्चारित करने लगे रीवा। फारसी में तो रीमाँ, रीवाँ लिखा ही जायेगा। क्योंकि उसमे ‘मँ’, ‘वँ’ हो जाता है।
साहित्य में मन रमाने वाले राजा जय सिंह ने सन 1820 में राज-काज सौंप दिया अपने बाबू साहब विश्वनाथ सिंह को। ये कुशल प्रशासनिक सिद्ध हुये। राज्य को प्रगति पथ पर लाकर माली हालत भी सुधारी और पाँच पीढि़यों के बाद राजकीय सेना भी इन्होने ही गठित की। कहा तो यह जाता है कि सेना का गठन इस मन्तव्य से किया गया था कि ‘एचईआईसी’ से लड़कर अपने राज्य का दक्षिणी बडा भूभाग छीन लें। क्यों कि संधि हो जाने के बाद भी बार बार माँग करने पर कम्पनी हीला हवाला करती आ रही थी। किन्तु राजा विश्वनाथ सिंह कम्पनी से पंगा लेने की हिम्मत न कर सके। सेना बिना काम के सफेद हाथी साबित हो रही थी। अतः उसका उपयोग सरहदी छोटे राज्यों और जागीरदारों को आधीनता स्वीकार कराने के लिये उपयोग में लाया गया। इस सेना ने राजकीय नादेहन्द इलाकेदारों और पवाईदारों पर भी दवाब बनाया। कई के आधे-चैथाई भूभाग छीन कर खालसे में शामिल कर लिये गये। कडा़ई से राजस्व वसूली होने लगी फलतः राजकोष लबा लब हो चला।
राजा विश्वनाथ सिंह भी पिता की भाँति ही महान साहित्यकार रहे हैं। हिन्दी भाषा का प्रथम नाटक ‘आनन्द रघुनन्दन’ इन्ही की देन है। पिता जय सिंह के सन 1833 में गोलोकवासी हो जाने पर बाबू विश्वनाथ सिंह राजा बन कर राजगद्दी पर बिराजे जिनका स्वर्गवास सन 1854 में हुआ। तब महाराज कुमार रघुराज सिंह ने बहैसियत राजा; राजसत्ता सँभाली। युवराज के लिये पूर्व काल से चले आरहे ‘बाबू साहब’ अलंकरण को राजा विश्वानाथ सिंह ने ही बदल कर ‘महाराज कुमार’ कर दिया था, जो राज्य विलीनीकरण तक अक्षुण रहा आया। अपनी धार्मिक धाक जमाने के लिये तत्कालीन राजे; मठ-मंदिरों की स्थापना और तुलादान आदि में अधिक रुचि रखते थे। इसी के साथ अपने वैभव-विलासिता, राजकीय परिवार के विवाह आदि में जनता से वसूले धन को बेरहमी से पानी की तरह बहा देने में अपना गौरव मानते थे। राजा रघुराज सिंह ने भी इस परंपरा का निर्वाह किया। ये भी अपने पितामह और पिता की भाँति महान साहित्यकार थे। इनकी सृजित ग्रंथ संख्या; पूर्वजों से अधिक हैं। इन्होने लिखा है- जाके विद्या ताहि नाह भूप भये भये ना। काव्य शक्ति पाय काह राज कये कये ना।
भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सन 1857 में राजा रघुराज सिंह ने राष्ट्र के विरुद्व ‘एचईआईसी’ को दिल खोल कर सहायता की थी। इन पर आक्षेप है कि इन्होन उक्त काल के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रणमत सिंह की गिरफ्तारी में सहयोग किया था। जबकि नैकहाई जुज्झि के अलावा अन्य जुज्झियों में रणमत्त सिंह के पूर्वजों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए अपने प्राण उत्सर्ग कर दिये थे। बचाते रहे रीमाँ राज्य को, पराधीन होने से। इनके पूर्वजों के नाम है स्वर्गीय खुमान सिंह इनके अनुज केसरी सिंह, भतीजे कमोद सिंह, बलभद्र सिंह और शिवराज सिंह। कल्पनीय है यदि नैकहाई जुज्झि में इन सब का सहयोग न होता, तो विजय न हुई होती तब रीमाँ राज्य की दशा क्या होती? ‘श्री अजीत फते नायक रायसा’ के कवि दुर्गादास ने तो लिखा है-‘नायक अभिमानी जानै कहा, ये तो हिन्दुआनो तुरकानो करि डारतो।’

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